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भारतीय वायुसेना (IAF) की रीढ़ माने जाने वाले सुखोई-30MKI फाइटर जेट्स जल्द ही एक नए और बेहद घातक अवतार में नजर आने वाले हैं।
रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) देश के सबसे बड़े 'सुपर सुखोई' अपग्रेड प्रोग्राम पर तेजी से काम कर रहा है।
इस महा-अपग्रेड की सबसे बड़ी जान है स्वदेशी 'विरूपाक्ष' (Virupaksha) AESA रडार, जो भारतीय रक्षा क्षेत्र में एक बहुत बड़ी तकनीकी छलांग है।
आइए आसान भाषा में समझते हैं कि यह नया रडार कितना ताकतवर है और क्या यह ड्रैगन (चीन) के स्टील्थ विमानों के गुरूर को तोड़ पाएगा।
मौजूदा समय में हमारे सुखोई विमानों में रूस का बना N011M Bars रडार लगा है। यह 80 के दशक की 'हाइब्रिड पेसा' (PESA) तकनीक पर आधारित है, जो आज के आधुनिक युद्ध के हिसाब से पुराना पड़ चुका है।
एयरो इंडिया 2025 में दुनिया के सामने पेश किया गया विरूपाक्ष रडार इसे पूरी तरह से रिप्लेस करेगा।
सुखोई-30MKI की नाक (Nose) काफी चौड़ी और बड़ी होती है, जिसका पूरा फायदा विरूपाक्ष रडार को मिला है। इसमें लगभग 950-mm का विशाल एंटीना और करीब 2,400 ट्रांसमिट/रिसीव (TR) मॉड्यूल्स लगाए गए हैं।
- AESA vs PESA: पुराने रडार सिस्टम एक बड़ी टॉर्च की तरह काम करते थे, जिनकी रोशनी एक ही दिशा में जाती थी। लेकिन विरूपाक्ष एक AESA रडार है। इसे आप 2,400 छोटी-छोटी 'स्मार्ट LED' मान सकते हैं, जो एक साथ अलग-अलग दिशाओं में दुश्मन पर नजर रख सकती हैं।
- GaN टेक्नोलॉजी का कमाल: इसमें पुरानी तकनीक की जगह 'गैलियम-नाइट्राइड' (GaN) तकनीक का इस्तेमाल हुआ है। आसान शब्दों में कहें तो यह रडार को बिना ज्यादा गर्म हुए, अधिक पावर पैदा करने और दुश्मन को बहुत दूर से ही पकड़ लेने की गजब की क्षमता देता है।
इसकी एक और सबसे बड़ी खूबी है इसका 'रिपोजिशनिंग मैकेनिज्म' (Repositioning Mechanism)। आम रडार फाइटर जेट की नाक में फिक्स होते हैं और सिर्फ सामने देखते हैं, लेकिन विरूपाक्ष जरूरत पड़ने पर अपनी दिशा को घुमा सकता है (Wide field of regard)।
इसका मतलब यह है कि अगर हमारा सुखोई दुश्मन पर मिसाइल दागने के बाद खुद को बचाने के लिए तेजी से मुड़ता है, तब भी रडार की "तिरछी नजर" दुश्मन पर लॉक रहेगी और मिसाइल को सही रास्ता दिखाती रहेगी।
चीन अक्सर अपने J-20 को 5वीं पीढ़ी का स्टील्थ फाइटर बताकर दुनिया को धमकाने की कोशिश करता है। स्टील्थ तकनीक का काम ही रडार की तरंगों को सोखना या भटकाना होता है, ताकि रडार की स्क्रीन पर जहाज दिखाई न दे।
DRDO ने विरूपाक्ष रडार की सटीक रेंज जैसी सीक्रेट जानकारियों का खुलासा नहीं किया है। लेकिन एक बात साफ है— किसी भी स्टील्थ विमान को खोजना सिर्फ रडार की पावर बढ़ाने का खेल नहीं है, यह वेदर, फ्रीक्वेंसी और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर पर भी निर्भर करता है।
हालांकि, विरूपाक्ष का विशालकाय साइज, GaN तकनीक से मिलने वाली अपार ऊर्जा, और दुश्मन की जैमिंग (ECCM) को नाकाम करने की क्षमता—चीन के J-20 के लिए एक बुरा सपना साबित होगी। पुराने रडार के मुकाबले यह किसी भी छिपे हुए टारगेट को बहुत दूर से ढूंढ निकालने में कई गुना ज्यादा सक्षम है।
यह सिर्फ एक रडार बदलने का प्रोजेक्ट नहीं है। जब विरूपाक्ष रडार के साथ स्वदेशी इलेक्ट्रॉनिक-वॉरफेयर सूट, इन्फ्रारेड सर्च एंड ट्रैक सिस्टम (IRST), हेलमेट-माउंटेड डिस्प्ले, और अस्त्र (Astra) सीरीज़ जैसी लंबी दूरी की स्वदेशी मिसाइलें जुड़ेंगी, तो सुखोई-30MKI एक 4.5+ जनरेशन का नेटवर्क-सेंट्रिक फाइटर जेट बन जाएगा।
यह अपग्रेड भारतीय वायुसेना को वह ताकत देगा, जिससे भारत अगले कई दशकों तक अपने आसमान में किसी भी दुश्मन को घुसने से पहले ही खाक कर सकेगा।